Chhapra Desk – छपरा में विगत 12 फरवरी को रहस्मय ढंग से लापता किशोर 6 दिनों तक यूपी के गाजीपुर क्षेत्र में किसी अज्ञात जगह पर अपहरणकर्ताओं के चंगुल में रहने के बाद लौट कर अपने गांव पहुंच गया है. अपनी आपबीती सुनाते हुए उसने बताया कि अपहरणकर्ताओं के द्वारा छह दिन में महज चार बार जली हुई रोटी और आलू-पालक की सब्जी खाने को दिया. यूपी के युसुफपुर रेलवे स्टेशन से करीब 30 किमी दूर किसी सुनसान स्थान पर लोहे की जंजीर में किशोर को अपहर्ताओं ने बांधकर रखा था. अपहर्ताओं के चंगुल से निकलने में कामयाब रहा मांझी के रनपट्टी गांव निवासी अभय सिंह का पुत्र प्रियांशू कुमार रहस्यमय ढंग से लापता हो गया था. परिजन उसे ढूंढने में दर दर की ठोकरें खा रहे थे. परिजनों ने प्रियांशू के लापता होने के सम्बंध में मांझी थाना में एक सनहा देकर पुलिस से मदद की गुहार भी लगाई थी.

अपहर्ताओं के चंगुल से मुक्त होने के बाद प्रियांशू ने बातचीत के क्रम में पत्रकारों को बताया कि वह गांव से पश्चिम उड़ियानपुर जाने वाली ग्रामीण सड़क के किनारे खड़ा था. तभी अचानक एक कार आकर रुक गई. कार में सवार चार संदिग्ध लोगों ने छपरा जाने वाली सड़क की जानकारी मांगी. प्रियांशू उनके समीप आकर बता ही रहा था तभी कार में सवार लंबी दाढ़ी वाले चार युवकों ने उसके मुंह पर रुमाल रखकर उसे बेहोश कर दिया और उठा कर लेकर चले गए. यूपी के गाजीपुर के किसी अज्ञात स्थान पर लेकर पहुंचे। वहां सुनसान इलाके में एक कर्कट नुमा मकान में ले जाकर उसे लोहे की जंजीरों से जकड़ दिया गया. उसके बाद नीले रंग का ड्रेस पहना दिया गया. जिस मकान में उसे बांध कर रखा गया था। वहां पहले से करीब डेढ़ दर्जन अन्य किशोर भी कैद करके रखे गए थे. उन सबको भी नीले रंग का ड्रेस पहनाया गया था। प्रियांशु ने बताया कि वहां आने-जाने वाले लोग अपना मुंह बांध कर रखते थे. भूख से तड़पते बंधक बच्चों को खाने के लिए चार रोटी और आलू पालक की सब्जी दी जाती थी. उसने बताया कि खाना में नशीला पदार्थ मिला होता था. जिससे खाना खाते ही सभी बच्चे दो दिन तक के लिए बेहोश हो जाते थे. छह दिन में मात्र चार बार ही उसे खाना खाने को मिला था. उसने बताया कि शुक्रवार की सुबह अचानक पुलिस का छापा पड़ा और सभी बंधकों के हाथ- पांव खोल दिये गए. उसके बाद पुलिस द्वारा सभी बच्चों को यूसुफपुर महमदाबाद स्टेशन ले जाकर एक ट्रेन में बैठा दिया गया.

प्रियांशू ने बताया कि पवन एक्सप्रेस में बिठाया गया। ट्रेन में बैठकर मुझे रोते हुए देखकर हाजीपुर के एक स्वर्णकार अंकल ने रोने का कारण पूछा तो मैंने अपनी आपबीती सुना दी. फिर स्वर्णकार अंकल ने अपने मोबाईल से परिजनों से संवाद स्थापित कराया वे खिलाते- पिलाते छपरा जंक्शन तक लेकर पहुंचे फिर उन्होंने प्रियांशू को आरपीएफ के हवाले कर दिया. बाद में आरपीएफ ने उसके परिजनों को बुलाकर प्रियांशु को सौंप दिया. प्रियांशु को सकुशल पाकर प्रियांशू के माता- पिता ने उसे कुछ देर तक अपने सीने से चिपकाये रखा खुशी से दोनों की आंखे भर आई.
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