
SARAN DESK – यह मेरे लिए अत्यंत गौरव और सम्मान की बात है कि आज मैं सारण जिले की पवित्र धरती सीताबदियारा में उपस्थित हूं. उस स्थान पर, जहां भारत के महानतम नेताओं में से एक, सच्चे जननायक, और न्याय व लोकतंत्र के अनथक प्रहरी लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी का जन्म हुआ था. आज जब हम उनके 123वें जन्म दिवस के अवसर पर एकत्रित हुए हैं, तो यह केवल एक महान व्यक्तित्व को नमन भर नहीं है. यह उस आदर्श का उत्सव है जो व्यक्ति से ऊपर राष्ट्र को, सत्ता से ऊपर मूल्यों को, और राजनीति से ऊपर जनता को स्थान देता है. लोकनायक जयप्रकाश या जेपी, जैसा कि सारा देश उन्हें स्नेहपूर्वक पुकारता है. केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि वे भारत के लोकतंत्र की आत्मा और अंतःकरण थे. स्वतंत्रता संग्राम से लेकर ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान तक, उनका जीवन नैतिक साहस, सादगी और त्याग का प्रतीक बना रहा.

लोकनायक को कभी भी सत्ता की लालसा नहीं थी. उन्हें जब सर्वोच्च पदों की पेशकश की गई, तो उन्होंने ससम्मान अस्वीकार कर दिया. उनकी शक्ति राजनीतिक पद में नहीं, बल्कि नैतिक अधिकार में निहित थी. उनका कहना था कि “मेरा उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि सत्ता पर जनता का नियंत्रण स्थापित करना है.” उक्त बातें देश के उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने जीपी के गांव सिताबदियारा में उनकी आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर कही. उन्होंने कहा कि आज जब हम अपने प्रिय नेता जेपी को श्रद्धापूर्वक याद कर रहे हैं, तो हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उनके संघर्ष में उनकी धर्मपत्नी प्रभावती देवी का अविस्मरणीय योगदान रहा. उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था, जो उनके निःस्वार्थ समर्पण का प्रतीक था.

भूदान आंदोलन में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सक्रिय भूमिका ने इस आंदोलन को नई विश्वसनीयता और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्रदान की है. विशेष रूप से बिहार में उन्होंने जन-जागरण किया, समाज को आत्मस्वार्थ से ऊपर उठकर सार्वजनिक कल्याण के लिए प्रेरित किया. संपूर्ण क्रांति के समय, जब समाज के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार फैल गया था, तब उन्होंने युवाओं में यह विश्वास जगाया कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण और लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का कार्य केवल वे ही कर सकते हैं. वे अहिंसक क्रांति में विश्वास करते थे, जो विचारों और नैतिकता की क्रांति हो, हिंसा की नहीं.

उनका आह्वान “संपूर्ण क्रांति” किसी हथियारबंद विद्रोह का नहीं, बल्कि विचारों के पुनर्जागरण का प्रतीक था. उन्होंने ऐसे भारत का सपना देखा जहां शासन पारदर्शी हो, गरीब सशक्त हों, और युवा राष्ट्र-निर्माण के अग्रदूत बनें. मेरे लिए यह व्यक्तिगत सौभाग्य और गौरव की बात है कि मेरा भी ‘संपूर्ण क्रांति आंदोलन’ से निकट संबंध रहा. मात्र उन्नीस वर्ष की आयु में, लोकनायक के आह्वान पर मैंने स्वयं को इस आंदोलन में समर्पित किया. उस समय मैं कोयंबटूर जिले में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का जिला महासचिव था. लोकनायक सदा लोकशक्ति को राज्यशक्ति से ऊपर मानते थे. वे मानते थे कि असली ताकत जनता की होती है, शासन की नहीं. आज भी हमारे लोकतंत्र की मजबूती उन्हीं मूल्यों पर टिकी है.

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