CHHAPRA DESK – पानी फल सिंघाड़ा की खेती के साथ मछली पालन से किसानों की जिंदगी संवर रही है. वहीं उन्हें अच्छा व डबल मुनाफा भी हो रहा है. इसके साथ ही लोगों को रोजगार भी मिल रहा है. सिंघाड़ा की खेती शहर से सटी मेथवलिया एवं करिंगा में भी की जा रही है. इस व्यवसाय में कुछ किसान ऐसे भी हैं जिनकी पुश्ते इस व्यवसाय में लगी हुई है. बता दे कि मार्च महीने में इसकी बुआई शुरू हो जाती है और सितंबर अक्टूबर से इसकी फसल आ जाती है. इस विषय पर शहर के जलालपुर निवासी किसान सुभान मियां ने बताया कि इस व्यवसाय में उनकी तीन पुश्ते लगी हुई है. उनका पुत्र अजीज और पोता साजिद दोनों इस इस व्यवसाय में जुड़े हैं. अभी लोग खुद तैयार कर लेते हैं और उसे अच्छी तरह सुखाने के बाद पानी भरे गड्ढे में पोटली बांधकर दबा देते हैं. जिसके बाद मार्च में उस पोटली को निकाल कर अंकुरित बीज को पोखर में चारों तरफ बुवाई कर देते हैं. सितंबर से फसल तैयार होकर सिंघाड़ा निकलने लगता है. पानी से सिंघाड़ा निकालने के लिए प्रतिदिन 4 से 5 मजदूर लगाते हैं.

प्रतिदिन निकल रहा 4 से 5 टन सिंघाड़ा
सिंघाड़ा की फसल अच्छी लेने के लिए समय-समय पर खाद व कीटनाशक का प्रयोग किया जाता है. जिसके बाद प्रतिदिन 4 से 5 टन सिंघाड़ा निकलता है. सिंघाड़ा खरीदने के लिए थोक व्यापारी पोखर पर ही पहुंचते हैं और खरीद कर ले जाते हैं.

सिंघाड़ा के साथ होता है मछली पालन भी
सिंघाड़ा की फसल जैसे ही थोड़ी कम होती है, उसमे मछली का बीज भी डाल दिया जाता है. जिसके कारण सिंघाड़ा के फसल खत्म होते-होते मछलियां तैयार हो जाती है और सिंघाड़ा के साथ मछली पालन भी हो जाता है. इस प्रकार सिंघाड़ा की खेती के साथ-साथ मछली पालन भी हो जाता है और वे लोग इस रोजगार में सालोंभर लगे रहते हैं.

होता है लाखों का मुनाफा
सिंघाड़ा के साथ मछली पालन से किसानों को डबल मुनाफा हो रहा है. इस व्यवसाय से जुड़े किसान सुभान मियां व अजीज मियां ने बताया कि सिंघाड़ा की खेती से उन्हें ढाई से तीन लाख का मुनाफा होता है. वहीं मछली पालन से भी चार से पांच लाख की आमदनी हो जाती है. इस व्यवसाय में उनका तीसरा पुश्त भी लगा हुआ है.

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