CHHAPRA DESK – दो दिनों तक सदर अस्पताल में RL/NS और ऑक्सीजन के सहारे चलते हुए यह बेटी जिंदगी की जंग हार गई. जी कर भी क्या कर लेती ? जिन अपनों को छोड़कर घर से बाहर खुदकुशी करने ट्रेन के आगे कूदी तो उसको घर वालों ने भी पहचानने से इनकार कर दिया. यूं कहे कि वह जान देने के मकसद में कामयाब हो गई ! लेकिन, स्वास्थ्य व्यवस्था, समाज और समाजसेवियों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ी कर गई. क्या उसका एक कदम गलत होना उसे जीने का अधिकार नहीं देता ? लेकिन बड़ा सवाल यह है कि उसे बचाता कौन ? आइये इस घटना पर प्रकाश डालते हैं ! घटना 18 फरवरी की संध्या की है, जब सारण जिले के मढौरा थाना अंतर्गत मढौरा रेलवे स्टेशन के समीप पाटलिपुत्र एक्सप्रेस ट्रेन के सामने कूदकर इस किशोरी ने जान देने का प्रयास किया.

उम्र महज 15 वर्ष ! ट्रेन के झटके से वह फेंका तो गई, लेकिन सिर में गंभीर चोट आई और वह जख्मी होने के बाद कोमा में चली गई. मढौरा थाना पुलिस ने उसे अनुमंडलीय अस्पताल पहुंचाया, जहां से उसे बेहतर चिकित्सा के लिए सदर अस्पताल रेफर किया गया. देर शाम तक अस्पताल में उसका इलाज शुरू किया गया. RL/NS व अन्य दवाएं भी चढ़ाई गई. ऑक्सीजन भी लगा दिया गया. लेकिन, यह उपचार काफी नहीं था. 19 फरवरी की सुबह और रात तक उसे होश नहीं आई. पूरे दिन वह बेहोश रही. अब जरूरत थी सिटी स्कैन करवाने और किसी मस्तिष्क चिकित्सक के उपचार की.

लेकिन, सिटी स्कैन का खर्च कौन वहन करता कौन उसे ले जाकर सिटी स्कैन करवाता ? और करवाता भी क्यों ? जब उसे अपनों ने ही छोड़ दिया. क्योंकि उसकी फोटो हलचल न्यूज़ के द्वारा सोशल मीडिया पर वायरल भी की गई थी. 40 घंटे तक बेहोश रहने के बाद आज अल सुबह उसकी मौत हो गई. जिसके बाद पुलिस ने कागजी कार्रवाई करते हुए शव का पोस्टमार्टम करवाया और पहचान नहीं होने के कारण अब शव को 72 घंटे तक के लिए पोस्टमार्टम कक्ष में सुरक्षित रखा जाएगा.

![]()

