खेती-किसानी : सरसों की खेती करने वाले किसान ऐसे करें पाले एवं रोगों से अपने फसल की सुरक्षा

खेती-किसानी : सरसों की खेती करने वाले किसान ऐसे करें पाले एवं रोगों से अपने फसल की सुरक्षा

CHHAPRA DESK – सारण में ठंड का प्रकोप बढ़ चुका है और पाला गिरना शुरू हो गया है. ऐसे में सरसो की खेती करने वाले किसानों के लिए यह मुश्किल का दौर है. ऐसी स्थिति में वे अपने सरसों की फसल को पाला और कीटों से कैसे सुरक्षा करें? आइए इस विषय पर हम राय लेते हैं सारण जिला के कृषि सहायक निदेशक राधेश्याम गुप्ता से. वैसे बता दें कि सरसों तिलहन फसलों की रानी है. भारत में इसकी बिजाई लगभग 75 लाख हेक्टेयर में की जाती है और उत्पादन लगभग 65 लाख टन होता है.

ऐसे करें सरसों फसल की सुरक्षा :

फसल का लाभकारी मूल्य मिलने, संकर किस्मों से अधिक उत्पादन की आशा से आकर्षित किसान भाई विगत वर्षों की अपेक्षा इस बार सरसों फसल की सुरक्षा में अधिक ध्यान देंगे. फसल सुरक्षा द्वारा उत्पादन की हानि को बचाना भी उत्पादकता बढ़ाना होता है. सरसों की फसल में मुख्य व्याधिया- बीमारियां सफेद रतुआ और तना गलन है.

सफेद रतुआ

सफेद रतुआ एक प्रकार का फंगस-फफूंदी रोग है. पुष्प क्रम स्तर तक पहुंच जाने तथा मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू) के लक्षणों से 17-30 प्रतिशत तक फसल में आर्थिक नुकसान हो जाता है. प्रारम्भिक अवस्था में इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तों के निचली तरफ सफेद रंग के फफोलों के रुप में बनते हैं. प्रभाव ज्यादा होने पर ये फफोले आकार में बढ़ कर मिल जाते है. पत्तों में फोटोसिथेसिस की क्रिया न होने से पत्ते गिर जाते हैं. भयावह हालात होने पर पुष्प बनने के स्थान पर सफेद पाउडर बन जाता है और पुष्प तथा फलियां नहीं बनती बल्कि पुष्पन भाग में विक्रतियां उत्पन्न हो जाती हैं और पुष्पवृत मुड़ जाता है. इस विक्रति को बारह सिंघा भी कहते हैं. इस बीमारी को फैलाने में 10 डिग्री से कम तापमान, वातावरण में 90 प्रतिशत सापेक्ष आद्र्रता तथा हल्की बंूदाबांदी बढ़ावा देती है.

इस व्याधि को रोकने के लिए आवश्यक है कि किसान जनवरी माह में सरसों फसल का रोज निरीक्षण करें. क्योंकि पहले पत्तों पर उत्पन्न लक्षणों के आधार पर कदम उठायें, क्योंकि कम ताप, आद्र्रता और बूंदाबांदी का समय बदलने से रोग का वातावरण बदलने से दवाई छिडक़ने का कोई लाभ नहीं होता, इसलिए कवकनाशी उपचार के लिए रोग आने का इंतजार किए बिना 400 ग्राम मेंकोजेब डायथेन एम-45, डायथेन 7.78, रिडोमिल का छिडक़ाव करें। रसायनिक तत्वों को छिडक़ाव के अलावा दूसरे उपाय भी करें जैसे प्रमाणित बीज का प्रयोग करना, 6 ग्राम प्रति किलो मेटालेक्सिल एप्रोन 35 डीएस से बीज को उपचारित करें.

स्क्लेरोटिनिया-तना गलन

सरसों में पिछले 15 साल से तना गलन का प्रकोप बढ़ा है और 25 से लेकर 100 प्रतिशत तक नुकसान हो रहा है. तना गलन को वैज्ञानिक भाषा में स्क्लेरोटिनिया स्क्लेरोटिनियम नामक फफूंद से होती है. इस रोग के प्रकोप लक्षण तब दिखाई देते हैं जब फसल में फलियां बन जाती हैं. इस समय पत्तियां कम हो जाती हैं और रसायन के छिडक़ाव का यथोचित लाभ नहीं मिलता, क्योंकि पौधों पर उस समय पत्तियां कम होने के कारण रसायन अवशोषण नहीं होता. इसलिए इस रोग के नियंत्रण के लिए कदम पहले ही उठा लें. इस रोग के लक्षण में सरसों के पौधों में जमीन से लगभग 6 इंच ऊंचाई पर तना सफेद होना शुरू हो जाता है. इस तने को तोड़ कर देखें तो यह सफेद भाग कपास जैसा हो जाता है. इस कपास जैसे भाग में लगभग 4-6 काले रंग के अनियमित आकार कजैसी रचना दिखाई देती है,

इन्हें स्क्लेरेटिनिया कहते हैं. बीमारी के लिए अनुकूल वातावरण के रुप में 85-90 प्रतिशत सापेक्ष आर्द्रता तथा 18.20 डिग्री सें० तापक्रम है. इस रोग का प्रभाव ज्यादा नाइट्रोजन का उपयोग तथा अधिक सिंचाई से भी होता है.इस रोग के नियंत्रण के लिए 200 ग्राम कार्बेंडाजिम का घोल 100 लीटर पानी मे तैयार करके प्रत्ति एकड़ फसल के बोआई के 70 दिन बाद कर दें. बोआई के समय बीज 2 ग्राम प्रति किलो से उपचारित करें. जैविक नियंत्रण के रुप में 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरडी तथा 5 ग्राम ट्राईकोडर्मा हैमेटम से बीज उपचारित करें तथा और 200 ग्राम ट्राईकोडरमा बिरडी तथा 200 ग्राम ट्राईकोडर्मा हैमेटम को 200 लीटर पानी में मिला कर बोआई के 50 दिन बाद स्प्रे करें. ध्यान रखें कि जैविक उपचार करने पर रासायनिक उपचार नहीं करें.

पाला

जीरो डिग्री सैलसियस से कम ताप पर पानी बर्फ में बदल जाता है. सरसों फसल में दाने बनते समय यदि तापमान शून्य से नीचे चला जाता है तो फलियों में दाना नहीं बनता. अत: अगेती फसल बोने से पाले से होने वाली क्षति से बचा जा सकता है. फूल निकलने या एक बार दाना बन जाने पर क्षति नहीं होती केवल दाना बनते समय पाले से हानि होती है. पाले से फसल क्षति बचाने के लिए पाला पडऩे की सम्भावना वाले दिनों में सरसों के खेत के आस-पास कूड़ा जला कर तापक्रम बढ़ायें. सल्फर के उत्पाद सल्फैक्स या थायो यूरिया के छिडक़ाव से भी पाले से हानि बचाई जा सकती है. पाला पडऩे से सरसों की फसल में प्रोटीन विखंडित हो जाती है और डिहाईड्रेशन होता है और प्रोटोप्लाज्म तथा प्रोटीन का डिहाईड्रेशन होता है। गंधक/सल्फर के छिडक़ाव से पौधों में प्रोटीन विखंडित नहीं होती और सरसों फसल की रक्षा हो जाती है. सरसों में पाला पडऩे के कारण 50 प्रतिशत तक हानि हो जाती है.अगर सरसो के पौधे बहुत ही छोटे है और फूल लगने लगे तो किसान भाई अग्रोमिन 5ml प्रत्ति लीटर पानी मे घोल तैयार करके छिड़काव करें.

एफिड या फसल में महू कीट के शिशु एवं वयस्क पौधे कोमल तनों, पत्तियों, फूलों एवं फलों से रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देते हैं। इस कीट से फसल सुरक्षा के लिए किसानों को डिमेथोट 30%EC का 1000 मिली प्रति 600 लीटर पानी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल प्रति 600 लीटर पानी में 200 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. या थियोमेथोकसम 25%WG का 5 ग्राम प्रति 15 लीटर पानी मे मिलाकर छिड़काव करना सुनिश्चित करे साथ मे सल्फर 80%WG का 2ग्राम प्रति लीटर पानी मे मिलाकर करने से अधिक फायदे होंगे.

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