CHHAPRA DESK- नवरात्र के चतुर्थ दिवस माता रानी के चौथे स्वरूप कूष्माण्डा माता की अराधना का दिन है. कहा जाता है कि बहुत समय पहले जब असुरों का आतंक बढ़ गया था, तब उन्हें सबक सिखाने के लिए मां दुर्गा ने अपने तीसरे स्वरूप में अवतार लिया था. दैत्यों का राजा महिषासुर राजा इंद्र का सिंहासन हड़पना चाहता था. जिसके लिए दैत्यों की सेना और देवताओं के बीच में युद्ध छिड़ गई थी. वह स्वर्ग लोक पर अपना राज कायम करना चाहता था. जिसकी वजह से सभी देवता परेशान थे. सभी देवता अपनी परेशानी लेकर त्रिदेवों के पास गए. पौराणिक मान्यता के अनुसार, मां कूष्मांडा से तात्पर्य है कुम्हड़ा. कहा जाता है कि मां कूष्मांडा ने संसार को दैत्यों के अत्याचार से मुक्त करने के लिए ही अवतार लिया था. इनका वाहन सिंह है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था तो देवी ने ही ब्रह्मांड की रचना की थी. इन्हें आदि स्वरूपा और आदिशक्ति भी कहा जाता है. मान्यता है कि इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में स्थित है.

माता कुष्मांडा देवी की कथा

माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व जब चारों ओर अंधकार था और कोई भी जीव जंतु नहीं था तो मां दुर्गा ने इस अंड यानी ब्रह्मांड की रचना की थी. इसी कारण उन्हें कूष्मांडा कहा जाता है. सृष्टि की उत्पत्ति करने के कारण इन्हें आदिशक्ति नाम से भी अभिहित किया जाता है. इनके स्वरूप का वर्णन करते हुए शास्त्रों में कहा गया है कि इनकी आठ भुजाएं हैं और ये सिंह पर सवार हैं. मां कूष्मांडा के सात हाथों में चक्र, गदा, धनुष, कमण्डल, अमृत से भरा हुआ कलश, बाण और कमल का फूल है तथा आठवें हाथ में जपमाला है जो सभी प्रकार की सिद्धियों से युक्त है.

मां दुर्गा के इस कूष्मांडा स्वरूप की पूजा अर्चना निम्न मंत्र से करनी चाहिये

सुरासंपूर्णकलशं,रुधिराप्लुतमेव च।


दधाना हस्तपद्माभ्यां,कूष्मांडा शुभदास्तु मे।।


अर्थात् अमृत से परिपूरित कलश को धारण करने वाली और कमलपुष्प से युक्त तेजोमय मां कूष्मांडा हमें सब कार्यों में शुभदायी सिद्ध हो।।

मां कुष्मांडा का मंत्र

1.या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

2.वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

सिंहरूढा अष्टभुजा कुष्माण्डा यशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।

कमण्डलु चाप, बाण, पदमसुधाकलश चक्र गदा जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीया कृदुहगस्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर हार केयूर किंकिण रत्नकुण्डल मण्डिताम्।

प्रफुल्ल वदनां नारू चिकुकां कांत कपोलां तुंग कूचाम्।

कोलांगी स्मेरमुखीं क्षीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ॥

3.ॐ देवी कूष्माण्डायै नम:॥

मां कूष्मांडा बीज मंत्र 

ऐं ह्री देव्यै नम:

मां कुष्मांडा देवी स्त्रोत

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दारिद्रादि विनाशिनीम्।

जयंदा धनदां कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगन्माता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।


चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुंदरी त्वंहि दु:ख शोक निवारिणाम्।

परमानंदमयी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

मां कुष्मांडा देवी कवच

हसरै मे शिर: पातु कूष्माण्डे भवनाशिनीम्।

हसलकरीं नेत्रथ, हसरौश्च ललाटकम्॥

कौमारी पातु सर्वगात्रे वाराही उत्तरे तथा।

पूर्वे पातु वैष्णवी इन्द्राणी दक्षिणे मम।

दिग्दिध सर्वत्रैव कूं बीजं सर्वदावतु॥

मां कुष्मांडा का भोग

मां कुष्मांडा को मालपुए बहुत प्रिय हैं इसीलिए नवरात्रि के चौथे दिन उन्हें मालपुए का भोग लगाया जाता है। मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। मां कूष्माण्डा देवी के भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कूष्माण्डा देवी अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होती हैं।

बुध ग्रह लिए करें मां कुष्मांडा की पूजा

मां कुष्मांडा की पूजा से बुध ग्रह मजबूत होता है. इसके लिए आप अपनी उम्र के हिसाब से हरी इलायची देवी मां को अर्पित करें. उसके बाद उस हरी इलायची को लाल कपड़े में बांधकर अगली नवरात्र तक अपने पास रखें. इससे आपको लाभ होगा.

मां कुष्मांडा का प्रिय फूल या पुष्प

चमेली का फूल या पीले रंग का कोई भी फूल चढ़ाने से देवी मां प्रसन्न होती हैं और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद देती हैं.

मां कूष्मांडा की आरती

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।

मुझ पर दया करो महारानी॥


पिगंला ज्वालामुखी निराली।

शाकंबरी मां भोली भाली॥


लाखों नाम निराले तेरे।

भक्त कई मतवाले तेरे॥


भीमा पर्वत पर है डेरा।

स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥


सबकी सुनती हो जगदम्बे।

सुख पहुंचती हो मां अम्बे॥


तेरे दर्शन का मैं प्यासा।

पूर्ण कर दो मेरी आशा॥


मां के मन में ममता भारी।

क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥


तेरे दर पर किया है डेरा।

दूर करो मां संकट मेरा॥


मेरे कारज पूरे कर दो।

मेरे तुम भंडारे भर दो॥


तेरा दास तुझे ही ध्याए।

भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥


पूजा के अंत में क्षमा प्रार्थना जरूर पढ़े

अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।

दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥1॥


आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।

पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥2॥


मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।

यत्पूजितं मया देवि क्षमस्व परमेश्वरी।।