SIWAN DESK - सिवान में एक ऐसी जगह है, जहां हर रक्षाबंधन पर हजारों लोग सिर्फ पूजा करने नहीं, बल्कि सदियों पुरानी एक दर्दनाक और रहस्यमयी कहानी को याद करने पहुंचते हैं. जिले के दरौंदा प्रखंड का भैया-बहिनी मंदिर भाई-बहन के अटूट प्रेम, त्याग और रक्षा की ऐसी लोकगाथा से जुड़ा है, जिसे सुनकर आज भी लोग भावुक हो जाते हैं. मान्यता है कि करीब 17वीं शताब्दी के मुगल शासनकाल में यहां कुछ ऐसा हुआ था, जिसने इस जगह को हमेशा के लिए आस्था का केंद्र बना दिया. स्थानीय मान्यता के अनुसार, रक्षाबंधन से दो दिन पहले एक भाई अपनी बहन को उसके ससुराल भभुआ से विदा कराकर डोली में घर लेकर लौट रहा था. डोली जब भीखाबांध के पास पहुंची, तभी मुगल सैनिकों की नजर उस पर पड़ी। कहा जाता है कि सैनिकों की नीयत खराब हो गई. उन्होंने डोली को रोक लिया और बहन के साथ बदसलूकी करने लगे. बहन की इज्जत बचाने के लिए भाई ने सैनिकों का विरोध किया और अकेले ही उनसे भिड़ गया. लेकिन सैनिकों की संख्या ज्यादा थी…भाई कमजोर पड़ गया और कथित तौर पर सैनिकों ने उसकी हत्या कर दी थी. तब भाई को अपने सामने मृत देखकर बहन पूरी तरह असहाय हो गई. लोकमान्यता है कि उसने भगवान को पुकारते हुए अपनी रक्षा की गुहार लगाई. कहा जाता है कि अचानक धरती फटी और भाई-बहन दोनों उसी धरती के अंदर समा गए. वहीं डोली लेकर चल रहे चारों कहार भी इस घटना से विचलित हो गए. स्थानीय मान्यता के मुताबिक उन्होंने भी पास के कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी.

जहां धरती में समाए भाई-बहन, वहीं उग आए दो विशाल बरगद

कहानी के मुताबिक, जिस स्थान पर भाई-बहन धरती के अंदर समाए थे, कुछ समय बाद वहीं दो विशाल वटवृक्ष दिखाई दिए. इन दोनों बरगदों को लेकर आज भी लोगों की गहरी आस्था है. दोनों पेड़ों की बनावट और फैलाव ऐसा है कि दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे भाई अपनी बहन को अपने साए में लेकर उसकी रक्षा कर रहा हो. यही वजह है कि यह स्थान धीरे-धीरे ‘भैया-बहिनी’ के नाम से प्रसिद्ध होता चला गया. पहले यहां मिट्टी का छोटा मंदिर बनाया गया. फिर श्रद्धालुओं की संख्या और आस्था बढ़ती गई तो बाद में पक्के मंदिर का निर्माण कराया गया. आज यही स्थान भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध है. रक्षाबंधन के दिन यहां का नजारा देखते ही बनता है. दूर-दूर से पहुंचने वाली बहनें वटवृक्ष को राखी बांधती हैं और अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की मन्नत मांगती हैं. कई श्रद्धालु वटवृक्ष पर राखी चढ़ाने के बाद उसे अपने भाइयों की कलाई पर बांधती हैं. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मन्नत भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम और खुशहाली लेकर आती है. श्रावण पूर्णिमा और भाद्र शुक्ल पक्ष की अनंत चतुर्दशी के मौके पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. सिवान के अलावा सारण, गोपालगंज, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण और पटना समेत बिहार के कई जिलों से लोग यहां आते हैं. इतना ही नहीं, उत्तर प्रदेश और झारखंड से भी श्रद्धालु भैया-बहिनी मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं.