CHHAPRA DESK- गंगा, सरयू और सोन नदियों के पावन मिलन स्थल चिरांद के त्रिवेणी संगम का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व प्राचीन काल से ही विशेष माना जाता है. मान्यता है कि इस पवित्र संगम तट पर कल्पवास करने, नियमित रूप से तीनों काल स्नान करने और सात्विक जीवनशैली अपनाने से मनुष्य के अंतःकरण की शुद्धि होती है तथा जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है.
यह बातें श्रीश्री 1008 देवेन्द्र ब्रह्मचारी उपाख्य मौनी बाबा ने कल्पवास के आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहीं. उन्होंने बताया कि कल्पवास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और आध्यात्मिक चेतना जागृत करने की एक प्राचीन ऋषि परंपरा है. उन्होंने कहा कि 'कल्प' का भाव कायाकल्प से जुड़ा है. सांसारिक मोह-माया, भौतिक सुख-सुविधाओं और दैनिक जीवन की भागदौड़ से दूर रहकर एक माह तक नदी तट की पवित्र मिट्टी और प्राकृतिक वातावरण में साधना करने से व्यक्ति के विचारों, व्यवहार और अंतःकरण में सकारात्मक परिवर्तन आता है. नियमित स्नान, पूजा-पाठ, ध्यान, जप और सात्विक दिनचर्या के माध्यम से मनुष्य स्वयं को आध्यात्मिक रूप से उन्नत करने का प्रयास करता है. मौनी बाबा ने चिरांद की पौराणिक महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र का संबंध च्यवन ऋषि और राजा मयूरध्वज की धार्मिक कथाओं से भी जोड़ा जाता है. ऐसे पवित्र स्थल पर कल्पवास करना प्राचीन ऋषि-मुनियों की तपस्या और साधना परंपरा का अनुसरण करने जैसा है. उन्होंने कहा कि कल्पवास के दौरान सात्विक नियमों का पालन, इंद्रियों पर नियंत्रण, सेवा, दान, ध्यान और ईश्वर के प्रति समर्पण का विशेष महत्व है. ऐसी साधना से व्यक्ति सांसारिक बंधनों से ऊपर उठकर मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है. चिरांद का त्रिवेणी संगम इस दृष्टि से श्रद्धालुओं के लिए आस्था, साधना और आत्मिक शांति का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.

