GOPALGANJ DESK - गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी (DM) जी. कृष्णैया हत्याकांड में पूर्व सांसद आनंद मोहन की समय से पहले रिहाई को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई. न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया. अब अदालत तय करेगी कि बिहार सरकार द्वारा दी गई रिहाई कानूनी रूप से सही थी या नहीं.
कोर्ट की टिप्पणी :अगर यह दुर्लभतम अपराध नहीं, तो फिर क्या है?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट की उस टिप्पणी पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि यह मामला 'दुर्लभतम अपराध' (Rarest of Rare) की श्रेणी में नहीं आता. इस पर न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने कहा कि यदि ड्यूटी पर तैनात किसी सरकारी अधिकारी की हत्या भी दुर्लभतम अपराध नहीं मानी जाएगी, तो फिर आखिर किस अपराध को इस श्रेणी में रखा जाएगा. उन्होंने कहा कि ऐसी सोच अपराधियों के लिए गलत संदेश दे सकती है. कोर्ट ने कहा कि अगर लोक सेवकों की हत्या को भी दुर्लभतम अपराध नहीं माना जाएगा, तो अपराधियों को लगेगा कि ऐसे मामलों में भी कठोर कार्रवाई नहीं होगी. पीठ ने कहा कि इस तरह की टिप्पणियां कानून का डर कम करती हैं और अपराधियों का मनोबल बढ़ा सकती हैं. अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार को ऐसे फैसले के खिलाफ अपील करनी चाहिए थी.
'बिहार की परिस्थिति अलग रही होगी, लेकिन पूरे देश की नहीं'
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने कहा कि संभव है उस समय बिहार की परिस्थितियां अलग रही हों, लेकिन दूसरे राज्यों में कोई न्यायाधीश शायद ऐसा नहीं मानेगा कि ड्यूटी पर तैनात अधिकारी की हत्या दुर्लभतम अपराध नहीं है. उन्होंने इस टिप्पणी को गंभीर और चिंताजनक बताया.
क्या है पूरा मामला?
5 दिसंबर 1994 को गोपालगंज के तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी. इस मामले में आनंद मोहन को दोषी ठहराया गया था. निचली अदालत ने उन्हें मृत्युदंड सुनाया था, जिसे बाद में पटना हाईकोर्ट ने आजीवन कारावास में बदल दिया. जिसके बाद बिहार सरकार ने 24 अप्रैल 2023 को सजा में छूट (Remission) देते हुए उन्हें जेल से रिहा कर दिया. इसी रिहाई को जी कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
बिहार सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?
बिहार सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार ने कहा कि आनंद मोहन ने पहली बार वर्ष 2021 में रिहाई के लिए आवेदन दिया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था. बाद में संबंधित अधिकारियों की सिफारिश मिलने के बाद उन्हें समयपूर्व रिहाई दी गई. उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में बिहार की कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहद खराब थी.
रिहाई के नियमों पर भी कोर्ट ने उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान रिहाई की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. कोर्ट ने कहा कि नियमों के अनुसार दोषी को 14 वर्ष की वास्तविक सजा और कुल 20 वर्ष की अवधि (रिमिशन सहित) पूरी करनी होती है.
अदालत ने कहा कि पहली बार आवेदन करते समय स्वयं आनंद मोहन ने माना था कि उन्होंने 20 वर्ष की शर्त पूरी नहीं की थी. ऐसे में कोर्ट ने पूछा कि जब जरूरी शर्त पूरी नहीं हुई थी, तो पहली बार आवेदन खारिज करना गलत कैसे माना जा सकता है?


